वित्त वर्ष 2026 में भारत के मुख्य इंडेक्स का प्रदर्शन पिछले छह सालों में सबसे कमज़ोर रहा है। इस साल दुनिया भर में चल रहे तनाव, कच्चे तेल की ऊँची कीमतों और विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पैसा बाहर निकालने जैसी घटनाएँ हुईं। इस कारण भारत के इंडेक्स दुनिया के ज़्यादातर दूसरे बाज़ारों से पीछे रह गए।
इस वित्त वर्ष के दौरान निफ्टी 50 में 5.1 फ़ीसदी की गिरावट आई जबकि सेंसेक्स 7.1 फ़ीसदी नीचे आया। महामारी से प्रभावित वित्त वर्ष 2020 के बाद दोनों इंडेक्स का यह सबसे खराब प्रदर्शन था। बाज़ारों का मिला-जुला हाल रहा, जहाँ निफ्टी मिडकैप 100 में 1.9 फ़ीसदी की बढ़त दिखी, वहीं निफ्टी स्मॉलकैप 100 करीब 6 फ़ीसदी गिर गया।
वित्त वर्ष 2026 में भारत का कुल बाज़ार मूल्य (मार्केट कैपिटलाइजेशन) 412 लाख करोड़ रुपये पर लगभग थमा रहा, जबकि 2 जनवरी 2026 को इसने 481 लाख करोड़ रुपये का शिखर छुआ था। कंपनियों की कमाई में शुरुआती नौ महीनों में अच्छी बढ़त के बाद, वैश्विक निवेश में अचानक आए बदलाव और सेक्टरों की कमज़ोरी के कारण बाज़ारों की रफ्तार धीमी पड़ गई। AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की वजह से दुनिया भर में कंपनियों के बजट में बदलाव हुआ, तो घरेलू आईटी शेयरों में भारी बिकवाली हुई और विदेशियों ने लगातार पैसा निकाला। इन सबने बाज़ार के माहौल पर बुरा असर डाला। निफ्टी आईटी इंडेक्स फरवरी में 19.5 फ़ीसदी गिर गया, जो सितंबर 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से इसकी सबसे बड़ी मासिक गिरावट थी। वित्त वर्ष के आखिर में बिकवाली और तेज़ हो गई क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ तीन महीनों में ही करीब 40 फ़ीसदी बढ़ गईं।
इससे भारत में महंगाई और बजट संतुलन को लेकर चिंताएँ बढ़ गईं, क्योंकि भारत तेल का एक बड़ा खरीदार है। भारतीय शेयर बाज़ार भी ज़्यादातर एशियाई बाज़ारों के मुकाबले पीछे रहे। तेल के लगातार दबाव के बीच रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया और बॉन्ड यील्ड भी बढ़ गई।
विदेशी निवेशक (FPI) लगातार बिकवाली करते रहे और वित्त वर्ष 2026 में उन्होंने रिकॉर्ड 1.82 लाख करोड़ रुपये बाहर निकाल लिए। इसकी भरपाई काफी हद तक घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) के 8.35 लाख करोड़ रुपये के मज़बूत निवेश से हुई, जिसने बाज़ार में बड़ी गिरावट को रोकने में मदद की। कमज़ोर होते रुपये ने विदेशी निवेशकों के मुनाफे को घटा दिया। बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयरों के प्रति आकर्षण कम हो गया, जिससे बाज़ार का मूड और भी ठंडा पड़ गया। निफ्टी अब लगातार चौथे महीने गिरा है, जिससे मूल्यांकन (वैल्यूएशन) कुछ हद तक कम हुए हैं। लेकिन ब्रोकरेज फर्में अभी भी सावधान रहने की सलाह दे रही हैं और इसकी वजह ऊँची एनर्जी कीमतों से जुड़े आर्थिक खतरे हैं।
गोल्डमैन सैक्स, सिटी, नोमुरा और यूबीएस जैसी बड़ी फर्मों ने भारत के लिए अपना भरोसा कम कर दिया है और निफ्टी के लिए लक्ष्य घटा दिए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतें लगातार ऊँची रहने से देश का आर्थिक हिसाब-किताब गड़बड़ा सकता है।
गोल्डमैन सैक्स ने कहा है कि लंबे समय तक ऊर्जा की ऊँची कीमतें भारत की आर्थिक स्थिति को बिगाड़ सकती हैं। उसने धीमी ग्रोथ, भारी महंगाई और बढ़ते घाटे के खतरों की ओर इशारा किया है। ब्रोकरेज फर्म ने 12 महीने के लिए निफ्टी का लक्ष्य घटाकर 25,900 कर दिया है और वित्त वर्ष 2026 के लिए आय वृद्धि का अनुमान भी घटाकर 8 फ़ीसदी कर दिया है, जो पहले के अनुमानों से काफी कम है।
उसने यह भी चेतावनी दी कि एआई से होने वाली उथल-पुथल की चिंताओं के कारण विदेशी निवेशकों की वापसी में देरी हो सकती है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (KIE) ने कहा कि हालिया सुधार से बाज़ार के कुछ हिस्सों में जोखिम और फायदे का संतुलन बेहतर हुआ है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि स्थितियां अभी एकदम तेज़ी वाली नहीं हैं।
