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टर्म इंश्योरेंस या हेल्थ इंश्योरेंस के लिए हर महीने पैसे देना सुनने में तो अच्छा लगता है क्योंकि इससे बजट नहीं बिगड़ता। लेकिन अगर हम बारीकी से देखें, तो यह बीमा खरीदने का सबसे कमज़ोर तरीका है।

यहाँ इसके कुछ नुकसान बताए गए हैं जो अक्सर छिपे रहते हैं:

1. कुल खर्चा ज़्यादा आता है (Frequency Loading)

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि अगर साल का प्रीमियम ₹12,000 है, तो महीने का ₹1,000 होगा। लेकिन असल में बीमा कंपनियां 12 बार ट्रांजेक्शन प्रोसेस करने का एक्स्ट्रा चार्ज लगाती हैं।

  • नुकसान: महीने वाले प्लान साल भर में 3% से 5% तक महंगे पड़ सकते हैं।

  • डिस्काउंट का नुकसान: अगर आप साल भर का पैसा एक साथ देते हैं, तो कई कंपनियां 10-15% तक की छूट देती हैं, जो महीने वाले प्लान में नहीं मिलती।

2. क्लेम के समय “कटौती का जाल” (Deduction Trap)

यह बात अक्सर छोटे अक्षरों (fine print) में छिपी होती है। अगर आप पॉलिसी के तीसरे महीने में क्लेम करते हैं, तो कंपनी के पास यह कानूनी अधिकार है कि वह आपके क्लेम के पैसे में से साल के बचे हुए 9 महीनों का प्रीमियम काट ले।

  • उदाहरण: मान लीजिए आपका साल का प्रीमियम ₹20,000 है पर आप महीने के ₹1,700 दे रहे हैं। दूसरे महीने में अस्पताल का बिल ₹1 लाख आता है। कंपनी आपको ₹1 लाख में से वो ₹17,000 काट कर देगी जो आपने अभी तक नहीं चुकाए हैं। ऐसे समय में जब आपको पूरे पैसे की ज़रूरत होती है, यह अचानक आई कटौती भारी पड़ सकती है।

3. पॉलिसी बंद होने का डर (Policy Lapse)

साल में 12 बार बैंक से पैसे कटने का मतलब है कि पेमेंट फेल होने के चांस 12 गुना बढ़ जाते हैं।

  • तकनीकी दिक्कतें: सर्वर डाउन होना, कार्ड एक्सपायर होना या खाते में पैसे कम होना—इनमें से किसी भी वजह से पेमेंट रुक सकती है।

  • कम मोहलत (Grace Period): सालाना पेमेंट के लिए अक्सर 30 दिन की मोहलत मिलती है, लेकिन महीने वाले प्लान में यह सिर्फ 15 दिन की होती है। अगर पॉलिसी बंद हो गई, तो उसे दोबारा शुरू करने के लिए फिर से मेडिकल चेकअप कराना पड़ सकता है।

4. कागज़ी कार्रवाई और सिरदर्द

  • टैक्स की दिक्कत: साल के आखिर में टैक्स बचाने के लिए 12 अलग-अलग रसीदें संभालनी पड़ती हैं और अपने CA या कंपनी को देनी पड़ती हैं।

  • बैंक स्टेटमेंट: अगर आपके पास कई इंश्योरेंस हैं, तो आपका बैंक स्टेटमेंट छोटी-छोटी किस्तों से भर जाता है, जिससे उसे ट्रैक करना मुश्किल होता है।

5. क्रेडिट स्कोर पर असर (अगर लोन पर है)

कभी-कभी ये महीने की किस्तें बीमा कंपनी नहीं, बल्कि कोई तीसरी कंपनी (Fintech) देती है जो एक तरह का ‘लोन’ होता है। अगर आपकी एक भी पेमेंट फेल हुई, तो यह आपके क्रेडिट स्कोर को खराब कर सकता है।

सही तरीका क्या है? “सिंकिंग फंड” (Sinking Fund)

बीमा कंपनी को 5% एक्स्ट्रा देने के बजाय, आप खुद का एक सिस्टम बना सकते हैं:

  1. अपने सालाना प्रीमियम को 12 से भाग (divide) दें।

  2. उतनी रकम की एक RD (Recurring Deposit) या अलग से किसी लिक्विड फंड में डालना शुरू करें।

  3. साल के आखिर में, उस जमा हुए पैसे से एक साथ सालाना प्रीमियम भरें।

फायदा: इससे आपको ब्याज भी मिलेगा, सालाना डिस्काउंट भी मिलेगा और आपकी पॉलिसी पेमेंट फेल होने के डर से 100% सुरक्षित रहेगी।