भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने म्युचुअल फंड नियमन के संशोधित स्वरूप को अधिसूचित कर दिया। इस तरह तीन दशक पुराने ढांचे में व्यापक संशोधन किया गया है। इन परिवर्तनों में खर्च के लिए संशोधित ढांचा, डिस्क्लोजर की सख्त अनिवार्यता और फंड हाउसों के लिए मजबूत प्रशासन नियम शामिल हैं। नए नियमों में प्रमुख प्रावधान यह है कि म्युचुअल फंड योजनाओं को नियामक की ओर से तय शर्तों के तहत प्रदर्शन के आधार पर खर्च अनुपात वसूलने की इजाजत दी गई है।

सेबी ने अधिसूचना में कहा, प्रदर्शन के आधार पर खर्च अनुपात वसूलने की पेशकश करने वाली फंड योजनाओं को समय-समय पर बोर्ड की ओर से तय खर्च अनुपात ढांचे और उससे संबंधित खुलासे का अनुपालन करना होगा।

सेबी बोर्ड की दिसंबर बैठक में मंजूर संशोधित नियम इस साल 1 अप्रैल से लागू होंगे। इस ढांचे में न्यासियों और प्रमुख प्रबंधन अधिकारियों की जिम्मेदारियों का भी विस्तार किया गया है। परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) में निगरानी को कड़ा करते हुए और प्रशासन से जुड़े मानकों को सुदृढ़ किया गया है।

एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव के तहत नियमन में आधार खर्च अनुपात (बीईआर) की अवधारणा को लागू किया गया है, जो निवेशकों के धन के प्रबंधन के लिए एएमसी द्वारा तो जाने वाली फीस को बताएगा। ब्रोकरेज, प्रभूति लेनदेन कर, स्टाम्प शुल्क और विनिम्ब शुल्क जैसे अन्य शुल्कों का खुलासा अलग से करना होगा। पहले, इन लागत को कुल खर्च अनुपात (टीईआर) में शामिल विधा जाता था।

सेबी ने सभी क्षेत्रों में ब्रोकरेज सीमा को भी तर्कसंगत बनाया है। नकदी बाजार में ब्रोकरेज सीमा को पहले के 8.59 आधार अंक से घटाकर 6 आधार अंक किया गया है।