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भारतीय कंपनी जगत को जल्द ही अपने कर्मचारियों के वेतन का कुछ हिस्सा म्यूचुअल फंडों की यूनिटों के रूप में देने की इजाजत मिल सकती है. एक परामर्श पत्र में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ खास मामलों में फंडों में थर्ड पार्टी भुगतान की अनुमति का प्रस्ताव किया है.

अभी, किसी निवेशक को म्यूचुअल फंड में निवेश अपने ही बैंक खाते से करना होता है. सेबी ने कहा कि इस नियम का मकसद गलत इस्तेमाल रोकना और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने वाले नियमों का पालन सुनिश्चित करना है. हालांकि नियामक ने बताया कि म्यूचुअल फंड सलाहकार समिति की सिफारिशों के आधार पर वह कुछ खास परिस्थितियों में तीसरे पक्ष के भुगतान की अनुमति की योजना बना रहा है. इनमें से एक प्रस्ताव के तहत नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों की ओर से फंडों की योजनाओं में निवेश करने की अनुमति मिल जाएगी.

सेबी ने कहा, प्रस्तावित व्यवस्था में नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मचारियों को अलग-अलग तरह के फायदे और बचत के मौके देने की पुरानी परंपरा को मान्यता दी गई है. इस व्यवस्था से फंड कंपनियों को वेतन में से कटौती करके फंडों में निवेश के लिए एक साथ भुगतान स्वीकार करने की सुविधा मिलेगी. यह सुविधा सूचीबद्ध कंपनियों, ईपीएफओ में पंजीकृत फर्मों और खुद परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) के लिए उपलब्ध होगी. इस व्यवस्था के तहत निवेश कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक रहेगा.

नियामक ने थर्ड पार्टी भुगतान लिए कई सुरक्षा उपाय सुझाए हैं. इनमें भुगतान करने वाले और पाने वाले के बीच के रिश्ते की पुष्टि, बेहतर केवाईसी जांच, ऑडिट ट्रेल्स और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि रिडेम्पशन यानी निवेश निकासी से मिली रकम सिर्फ पाने वाले के सत्यापित बैंक खाते में निवेशक के ही जमा हो.

एक अलग प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि नियामक ढांचे के जरिए अपने फंड निवेश या उससे मिले रिटर्न का कुछ हिस्सा सामाजिक कार्यों में दान करने की सुविधा दी जाए. इस प्रस्ताव के तहत निवेशक अपनी सब्सक्रिप्शन राशि, लाभांश या रिडेम्पशन से मिली रकम का एक हिस्सा दान दे सकते हैं. सेबी ने इसके लिए दो संभावित तरीके बताए हैं, या तो सोशल कंट्रीब्यूशन की सुविधा वाली खास फंड योजनाएं शुरू करना या फिर मौजूदा योजनाओं को ही इस विकल्प की अनुमति देना.

दान को सोशल स्टॉक एक्सचेंज पर पंजीकृत गैर-लाभकारी संगठनों द्वारा जारी जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल (जेडसीजेपी) योजनाओं में लगाया जा सकता है या सीधे उन एनजीओ को दिया जा सकता है, जिनकी पहचान योजना के दस्तावेज में की गई है. सेबी ने कहा कि फंडों के जरिए दान देने की सुविधा से निवेशकों पर भरोसेमंद एनजीओ की खुद से पहचान करने का परिचालन संबंधी बोझ कम होगा.

नियामक ने कहा कि सोशल संस्थाओं के जरिए योगदान भेजने से पारदर्शिता की मजबूत परत मिलेगी और निवेशकों को यह भरोसा होगा कि उनका पैसा सुरक्षित है. इस फ्रेमवर्क में सख्त जानकारी सत्यापित संस्थाओं तक पहुंच रहा की शर्तें, फंड के अंतिम इस्तेमाल की समय-समय पर रिपोर्टिंग और निवेशक से स्पष्ट और पूर्व में सहमति लेना भी जरूरी होगी.